Manzil bhi meri h || मंजिल भी मेरी है……..

Manzil bhi meri h

मंजिल (Manzil) भी मेरी है,कारवां भी मेरा है।

फैसला भी मेरा है, सोच भी मेरी है।

होसले भी मेरे है, ताकत भी मेरी है।

ना कोई रास्ता मालूम है, और ना कोई साथी है।

राहे भी अलग है, लोग भी अजनबी है।

मगर सपने तो मेरे है।

चलना भी मुझे अकेले ही है।

और अगर गिर भी जाऊं तो सम्भलना भी मुझे ही है।

—Pooja Sorout ( Haversackfullofthoughts)

 

 

4 Comments
  • Seeta singh
    Posted at 12:13h, 25 December Reply

    Greats lines

  • Raani sharma
    Posted at 05:12h, 24 December Reply

    Great lines dear

    • haversack
      Posted at 05:41h, 24 December Reply

      thank you dear friend

  • Surya pratap
    Posted at 05:11h, 24 December Reply

    Very nice poem

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